Tuesday, October 13, 2009

KRISHNA KI CHETAVANI

varsho tak van me ghom ghoom
badha vighno ko chum chum
sah dhoop dham pani patthar
pandav aaye kuchh or nikhar

soubhagya na sab din hota he
dekhe aage kya hota he

maitri ki raah dikhane ko
sab ko sumarg pe laane ko
bheeshan vidhwans bachane ko
bhagwan hastinapur aaye
panddav ka sandesha laaye

do rajya agar to adha do
par isme bhi yadi badha ho
to dedo kewal paach gram (gaon)
rakho apni dharti tamam

hum vahi khushi se khayenge
parijan pe asi(ungli) na uthayenge

duryodhan woh bhi de na saka
ashish samaj ki le na saka
ulte hari ko bandhne chala
jo tha asadhya sadhne chala

jab naash manuj par chhata he
pehle vivek mar jata he

hari ne bheeshan hunkar kiya
apna swaroop vistar kiya
dagmag dagmag diggaj dole
bhagwan kupit hokar bole

janjeer badha ab saadh mujhe
haa haa duryodhan baandh mujhe
hitvachan nahi tune maana
maitri ka moolya na pehchana

to le mai bhi ab jata hoo
antim sankalp sunata hoo

yachna nahi ab rann hoga
jeevan jay yaki maran hoga
takraenge nakshatra nikar
barsegi bhu par vehni prakhar

fann sheshnaag ka dolega
vikraal kaal muh kholega
duryodhan rann aisa hoga
fir kabhi nahi jaisa hoga

bhai par bhai tootenge
vish baan boond se chhutenge.

thi sabha sann sab log dare
chup the ya the behosh khade
kewal do nar na aghaate the
dhritrashtra vidur sukh pate the

kar jod khade pramudit nirbhay
dono pukarte the jay jay.

I M SORRY,
I REMEBERED ONLY THIS MUCH..
IF ANYONE CAN ADD THE REST...

छिपा हुआ सत्य

दोस्तों, मैं एक पेड हूँ. नीम का एक विशाल पेड़. कई साल से यहाँ खडा रहने के बावजूद एक लम्बा सफर तय कर चुका हूँ. सही, सही तो उम्र का पता नहीं लेकिन वो बूढा जो मेरी छाया मैं टूटी खाट पर लेटा है, उससे करीब दस साल छोटा हूँ. आज मौसम ठीक नहीं है. बहुत तेज़ हवा चल रही है. मेरी टहनियों पर बने घोंसलों मैं बसेरा बनाने वाले पक्षी शायद डर रहे हैं. क्यों न डरें, कुछ भी तो हो सकता है इस आंधी तूफ़ान में.

इसी तरह की एक आंधी बहुत दूर से मुझे उड़ाती हुई यहाँ लायी थी. कितना डरा सहमा हुआ था मैं. होता भी क्यों नहीं, आखिर मैं था ही क्या. एक छोटा सा निरीह बीज. जिन्दगी कब ख़त्म हो जायेगी, इसका पता नहीं था मुझे. लेकिन फिर भी मन मैं एक इच्छा थी, जीने की इच्छा. पता नहीं क्यों, मुझे अहसास होता था कि मेरे अन्दर कुछ है जो बाहर आना चाहता है.

ईश्वर बहादुरों का साथ देता है !

सबसे पहले दोस्ती हाथ बडे मिटटी ने. अपने सीने से मुझे इस तरह लगाया जैसे माँ अपने बच्चे को चिपकाती है. मैंने देखा कि मेरे ऊपर कि परत खुल रही है और कुछ ही दिनों में मैं अंकुरित हो उठा.

बीज से पोधा बनने वालों मैं केवल मैं ही नहीं था. मेरे कई दोस्त भी मेरे आस पास थे. एक दिन हादसा हुआ. पास रहने वाली पालतू बकरी मेरे तीन दोस्तों को हज़म कर गयी. सारी रात मैं सो नहीं सका. लगता था कि मिटटी मैं मिलने और अंकुरित होने की सारी मेहनत बेकार गयी. सारी रात मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहा- ” हे ईश्वर, मैं जीना चाहता हूँ, विशाल बनना चाहता हूँ, अपनी छाया मैं लोगों की थकान दूर करना चाहता हूँ, अपने गुणों को बांटना चाहता हूँ.”

ईश्वर ने प्रार्थना सुनी और अगली सुबह चमत्कार हुआ. दस साल का एक लड़का मेरे पास आया और बहुत प्यार से मेरी तरफ देखने लगा. देखते देखते उसने मेरे चारों ओर ईंटो का घेरा बना दिया. ईश्वर ने मेरी रक्षा के लिए उसे भेजा होगा.

अब मैं चैन से रह सकता था.

दोस्तों, मेरी छाया मैं लेटा ये खांसता हुआ बूढा वही दस साल का बच्चा है. जब ये मेरी छाया मे लेटता है तो मेरे दिल को एक महान प्रसन्नता होती है.

हाँ, तो मैं ये कह रहा था की ईंट का घेरा लगने के बाद मुझे किसी बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. थोडा बहुत पतझड़ - सावन, गर्मी- सर्दी तो लगा ही रहता है.

आज मुझे अपनी विशालता पर गर्व है. मुझे डराने वाले भेंड़ बकरियां अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. और तो और, कई बार उन बददिमाग जानवरों को मेरे मजबूत तने से बाँध दिया जाता है. जब वे अपने मजबूत सर को बेबसी से मेरे तने पर रगड़ते हैं तो लगता है जैसे अपनी पुराणी धृष्टता पर पश्चाताप कररहे हैं.

मुझे याद आता है वो दिन जब मैं मिटटी मैं मिला था. मेरे साथ के कई बीजों ने मिटटी का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया और अपनी कड़ी खाल के साथ दम तोड़ दिया. दोस्तों, नयी शक्ति के विकास के लिए पुराणी कड़ी परतों को तोड़ना ही पड़ता है.

आज कितनी ख़ुशी मिलती है मुझे – जब वैद्यराज औषध के लिए मेरी तःनिहिया ले जाते हैं. जब मेरी सूखी लकड़ियों से घरों के चूल्हे जलते है. हाँ ईश्वर, हाँ! यही चाहता था मैं.

मुझे मालुम है की मेरे दोस्त की तरह मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ और एक दिन फिर से मिटटी मे मिल जाऊँगा लेकिन मैं मरूँगा नहीं.

किसी महात्मा के उपदेश और कवि ही ह्रदयस्पर्शी कविता की तरह मेरे बीज भी दूर दूर तक फैल चुके हैं और अंकुरित भी हो चुके हैं मैं फिर से जीयूंगा, मैं उनके अन्दर जीयूंगा क्योंकि सत्य कभी मरता नहीं है.